Kendriya Vidyala

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Rajbhasha

 

ज़िंदगी


मैं ने ज़िंदगी से पूछा
सब को इतना दर्द क्यों देते हो ?
ज़िंदगी ने हंस कर जवाब दिया
मैं सबको खुशी देता हूं, पर
एक – एक खुशी दूसरे का
दर्द बन जाए तो इसमें
मेरा क्या कसूर है !!
तो ज़िंदगी ने यह कहा कि
आगे बढ़ो यह सोचकर
एक दिन होगा सब केलिए
रोशनी भरे खुशियां|
आखिर ज़िंदगी तो एक
कुरुक्षेत्र है जिससे कोई बचाव
सोच ही नहीं सकते |और
यह भी कहा कि  ज़िंदगी
वरदान या अभिशाप यह
निर्णय भी अपने करतूत में है |

द्वारा
जयंती [पी जी टी हिन्दी]

 

समय


समय  एक झरना बहता जाए
कब थामेगा ये ? कोई मुझे बताए ||
हर कर्म यह करवाता फिर फल भी दिलवाता
क्या सही है, क्या गलत, यह नहीं बताता
और समय निकाल जाने पर मानव सिर्फ पछताता |
रावण से सीता हरवाता फिर राम से
इसकी सजा भी दिलाता |

जब होती कोई अनहोनी सब समझाए
समय गलत है एसे जाने दिया जाए
लेकिन आती जब कोई खुशी
हर कोई चाहे क्यों न यह थम जाए |

सुख – दुख, जन्म –मृत्यु इस पर ज़ोर न किसी का चले,
लेकिन समय ही एक ऐसा जो हर पल साथ चले |
ये तो साक्षी हर इतिहास का,
और रहेगा होने वाले हर क्रिया-कलाप का |

स्वयं न लेता विराम एक पल केलिए
फिर क्यों सुला रखा है मुझे जन्मों – जन्मों के लिए |
कौन हूं मैं ? क्यों हूं मैं? कहां से आया हूं और कहां जाऊं
अब तो कोई मुझे बता दे |


द्वारा
चंद्रमोहिनी [टी.जी.टी.हिन्दी]

 

                
साथ चलेंगे

हम चलेंगे, हम चलेंगे, हम चलेंगे रे
हम बढ़ेंगे हम बदेंगे हम बदेंगे रे

न छोड़े भारत को
न छोड़े माता को
बनाएंगे बनवाएंगे
इसी को कर्मभूमि हम ||

जान लें भारतवासी
जांच ले भारतवासी
बांट लें भारतवासी संसाधनों को
पा सकें जीत को भी
जा सकें आगे हम भी
न चलें विदेश को रे
विदेशी को भी यहां आने देंगे रे ||

शारदा के उपदेशों को
कलाम की अभिलाषा को
चाव्ला की धीरज को भी अपना लेंगे रे
ला सकें शांति को भी
गा सकें जीत को भी
छू सकें तारों को रे
सूरज को भी अपना लेंगे रे ||

 

                              सुश्री.कलावती [पी.आर.टी]

छोटी सी कहानी
एक दिन जंगल में
कछुआ और खरगोश की
दौड़ शुरू हुई |

कछुए तो धीरे चला
भागा था खरगोश
क्या किया था
खरगोश क्या किया था |

रास्ते में सो गया
रास्ते में सो गया
कछुए तो धीरे चला
क्या हुआ था अंत में |

कछुए तो जीत लिया
हारा था खरगोश
जान गया रे
धीरे – धीरे ही सब कुछ होगा |

द्वारा
श्रीमति जमुना [पी.आर.टी]

 

बरसात के मौसम मे मोर नाच रहा है
गीता
सूखी गर्मी के मौसम मे
सुखी बारिश को बरसाने मे
गीता की वाणी सुनके
गीत तो आई मन के

 

इंतजार का इम्तिहान
खुदा की कसम खाकर जो बंधन हुआ
बेटे के सौधा पर ज़्यादा हुआ
कमाई के नाम पर जो काम हुआ
द्वार पर इंतजार का इंतिहान हुआ

खामोश
खामोश रहने का मतलब है
मूँह बंद करके चुप रहना नहीं
दस दिसी फिरनेवाले
मनको बंद करके रहना है I

द्वारा
जमुना [पी.आर.टी]

 

बालश्रम के आगे भयभीत बचपन


 कचरे के ढ़ेर मे ढूंढ रहा वह अपना जीवन
किसने छीन लिया,आज उसी से उसका बचपन |
बचपन की आदतों से परे,बस देखने जब वह दौड़ा
बड़ी -बड़ी आंखे दिखाकर ,मालिक ने उसे दौड़ के पकड़ा
बड़ा चला था बस देखने, एरोप्लेन दिखलाऊँगा |
बर्तन यदि नहीं धोये तो बाप से धुलवाऊंगा |
मारा इतना बालक था, सह नहीं वह कुछ पाया
हुआ बेहोश, आँख खुली तो,बंद कमरे मे खुद को पाया |
खड़े रहे चुपचाप सभी , जैसे देखे वो तमाशा
ज़ुल्म हुआ इस बचपन में,जिसकी थी उसे न आशा |
यूं ही इक बचपन फिर खोया, इस दुनिया की दौड़ में
मासूमियत अब गई सहम ,खो गई जीवन की होड में |

कु . शारदा प्रजापति                                               

पी.आर.टी(संगीत)

 

 

 

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